भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी

प्रेस विज्ञप्ति

8 जुलाई 2012

दक्षिण बस्तर के बासागुड़ा जेगुरगोण्डा इलाकों में सरकारी सशस्त्र बलों द्वारा मचाए गए आदिवासियों के कत्लेआम का खण्डन करो!

देश की सम्पदाओं को कार्पोरेट घरानों को सौम्पने की साजिश के तहत फासीवादी शासक वर्गों द्वारा जारी जनता पर युद्ध - आपरेशन ग्रीनहंट को रोकने आगे आओ!

सोनिया-मनमोहन-चिदम्बरम-प्रणब मुखर्जी-जयराम रमेश के शासक गिरोह की अगुवाई में पिछले तीन सालों से आपरेशन ग्रीनहंट के नाम से लुटेरे शासक वर्गों द्वारा जनता पर एक अन्यायपूर्ण युद्ध जारी है। इसके तहत जून 28-29 की दरमियानी रात छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिला, ऊसूर विकासखण्ड, बासागुड़ा पुलिस थाने से थोड़ी ही दूर पर स्थित गांव सारकिनगुड़ा में अत्यंत पाशविक हमला किया गया। बीजापुर और सुकमा जिलों से एक साथ निकले सशस्त्र बलों ने वहां पर एक घोर नरसंहार को अंजाम दिया। सीआरपीएफ-कोबरा, राज्य पुलिस बलों और कोया कमाण्डो के करीब एक हजार लाइसेंसी हत्यारे इस इलाके के गांवों पर टूट पड़े थे। फसलों और त्यौहारों के बारे में चर्चा करने के लिए गांव के बीचोबीच इकट्ठे हुए तीन गांवों के लोगों को चारों ओर से घेरकर अंधाधुध और एकतरफा ढंग से की गई गोलियों की बौछार से कई लोगों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। कई अन्य घायल हो गए। रात भर गांव में उत्पात मचाने वाले भाड़े के सशस्त्र बलों ने कुछ अन्य लोगों को घरों में घुसकर गोली मार दी। महिलाओं पर यौन हमलों के अलावा कई घरों में लूटपाट भी मचाई। खून से लथपथ घायल लोग जब पानी के लिए तरस रहे थे तो इन निर्दयी हत्यारों ने सिर्फ उन्हें पानी देने से मना किया, बल्कि देने की कोशिश करने वाले उनके परिजनों को बाहर निकलने से गोली मार देने की धमकियां दीं।

मारे जाने वालों में सारकिनगुड़ा के पांच, कोत्तागुड़ा के 9 और राजुपेटा गांव के तीन - कुल 17 लोग शामिल हैं। कई अन्य घायल हो गए। मृतकों में नौ नाबालिग थे जिनकी उम्र 12 से 16 के बीच थी। घायलों में भी किशोर, बूढ़े और महिलाएं शामिल हैं। बाकी लोग डर के मारे तितर-बितर हो गए। उसी दिन सुकमा जिला के कोंटा विकासखण्ड, जेगुरगोण्डा पुलिस थाना अंतर्गत ग्राम सिमलीपेंटा में दो आदिवासी किसानों को सरकारी सशस्त्र बलों ने गोली मार दी। इस जघन्य हत्याकाण्ड पर परदा डालने के लिए हमेशा की तरह मुठभेड़ का झूठ गढ़कर मीडिया के जरिए यह प्रचार किया गया कि ये सभी लोग उस समय मारे गए थे जब माओवादियों ने उन पर घात लगाकर हमला किया था। घटनास्थल से कुछ हथियारों और विस्फोटक समग्रियों को जब्त करने की फर्जी घोषणा भी की गई। माओवादियों की ओर से की गई गोलीबारी में सीआरपीएफ के छह जवानों के घायल होने की एक और मनगढ़ंत कहानी फैलाई गई ताकि झूठ को सच में बदला जा सके। स्थानीय लोगों के अलावा घटनास्थल का मुआयना करने वालों का भी यह साफ कहना है कि वहां पर मुठभेड़ हुई ही नहीं थी, बल्कि वे क्रासफायर में, यानी अपनी ही गोलियों से घायल हुए होंगे।

अगले दिन केन्द्रीय गृह मंत्री चिदम्बरम, जो आपरेशन ग्रीनहंट के सीईओ के रूप में काम कर रहे हैं, ने यह कहकर कि यह ठोस पूर्व सूचना के आधार पर किया गया सुनियोजित हमला था, अपने हत्यारे बलों की पीठ थपथपाई। इसके तुरंत बाद बासागुड़ा के आसपास के गंावों के लोगों ने सड़कों पर आकर घोषणा की कि यह एक नरसंहार था, कि सभी मृतक आम ग्रामीण थे और कि चूंकि वहां पर कोई माओवादी था ही नहीं, इसलिए मुठभेड़ होने का सवाल ही नहीं उठता। मीडिया में प्रकाशित तस्वीरें देखने पर हर कोई आसानी से समझ सकता है कि मृतक कौन हैं। लेकिन चिदम्बरम, रमनसिंह, ननकीराम, विजयकुमार, अनिल नवानी, रामनिवास, लांगकुमेर आदि मंत्री-अधिकारीगण जोकि गोबेल्स के ठेठ भारतीय अवतार हैं, इसे सही मुठभेड़ साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। हर तरफ से प्रकट हो रहे विरोध और जनाक्रोश को देखते हुए प्रदेश कांग्रेस पार्टी ने इस घटना पर जांच के लिए एक कमेटी नियुक्त की। उसने यह कहकर कि मारे जाने वालों में माओवादियों से ज्यादा आम ग्रामीण शामिल थे और रमन सरकार ने केन्द्र को गलत रिपोर्ट भेजी है, यह दिखलाने की कोशिश की कि इसमें केन्द्र सरकार की कोई भूमिका नहीं थी। चिदम्बरम ने इसे पूरी तरह पारदर्शी कार्रवाई होने का ढोंगी दावा करते हुए कहा है कि अगर इसमें कोई निदोष आदमी मारा गया हो तो उसके लिए उसे खेद है। और अंततः उसने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि चूंकि यह हमला राज्य बलों की योजना के तहत हुआ था, इसलिए इस पर जांच करवाने या करवाने का फैसला राज्य सरकार को ही लेना है। इधर रमनसिंह सरकार ने रस्मी तौर पर उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के द्वारा जांच का आदेश दिया जैसा कि उसने पहले कई बार किया था। देश की जनता को अच्छी तरह मालूम है कि ऐसी जांचों से कुछ होने वाला नहीं है और इससे दोषियों को सजा मिलने की उम्मीद बांधना बेमानी ही होगा।

इस पर हर तरफ से हो रही निंदा पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री रमनसिंह ने यह कहकर कि माओवादी आम जनता को ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, अपने फासीवादी हत्याकाण्ड को जायज ठहराने की कुचेष्टा की। गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने अपने फासीवादी चरित्र का भद्दा प्रदर्शन करते हुए कहा है कि माओवादियों के साथ जो भी होगा वह माओवादी ही है इसका मतलब है उन्हें किसी को भी मार डालने का अधिकार है। कार्पोरेट घरानों के सुर में सुर मिलाने वाले मीडिया ने वही घिसा-पिटा राग आलापना शुरू किया कि माओवादियों और सरकार के बीच हो रहे संघर्ष में निर्दोष आदिवासी पिसते जा रहे हैं। कुछ और अवसरवादी इस कहानी को प्रचारित कर रहे हैं कि चूंकि यहां पर यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कौन माओवादी है और कौन नहीं, इसलिए रात के अंधेरे में सरकारी सशस्त्र बल गलती से इस कार्रवाई को अंजाम दिए होंगे।

जैसा कि शुरू में ही बताया गया, यह नरसंहार शासक वर्गों द्वारा जनता पर जारी युद्ध का हिस्सा है। जनवरी 2009 में किए गए सिंगारम नरसंहार से शुरू कर वेच्चापाड़, सिंगनमडुगु, पालचेलमा, गोमपाड़, गुमियापाल, कोकावाड़ा, ताकिलोड़, ओंगनार आदि कई जगहों पर किए गए आदिवासियों के कत्लेआमों के सिलसिले की अटूट कड़ी ही है यह। 2005-07 के बीच चले सलवा जुडूम के दौरान भी ऐसे कई हत्याकाण्डों को अंजाम देने का इतिहास रहा है रमन सरकार का। सलवा जुडूम के दौरान की गई 500 से ज्यादा हत्याओं, 99 यौन अत्याचारों और 103 गांव-दहन के मामले सर्वोच्च अदालत में लम्बित हैं, जिससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि वास्तविक तबाही कितनी ज्यादा होगी। आदिवासियों का सफाया कर, उन्हें अपने निवास स्थलों से खदेड़कर, यहां की सारी प्राकृतिक सम्पदाओं को टाटा, एस्सार, जिंदल, मित्तल, नेको, रियो टिंटो, डी बियर्स, बीहेचपी जैसी दलाल पूंजीपतियों और साम्राज्यवादियों की कार्पोरेट कम्पनियों के हवाले करने की साजिश का हिस्सा ही हैं ये हत्याकाण्ड।

हाल ही में, पुलिस अधिकारियों ने अखबारों के जरिए यह घोषणा की थी कि जून 2012 में वे एक बड़ी रणनीतिक आपरेशन शुरू करने जा रहे हैं। आदिवासियों के विकास की रट लगाते नहीं थकने वाले और फासीवादी आपरेशन ग्रीनहंट को मानवीय मुखौटा पहनाने की मूर्खतापूर्ण प्रयास करने वाले केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने हाल ही में सुकमा जिले का दौरा किया था। केन्द्रीय गृह सचिव आर.के. सिंह भी अभी-अभी चिंतलनार का दौरा कर चुका था। सीआरपीएफ के डीजी विजयकुमार ने सुकमा और चिंतलनार का दौरा किया था। जाहिर सी बात है, ये सभी इस भारी हत्याकाण्ड के पीछे सूत्रधार थे। यह एक सुनियोजित हत्याकाण्ड था जिसका फैसला चिदम्बरम और रमनसिंह ने लिया था। यह सशस्त्र बलों द्वारा गलती से या जल्दबाजी में की गई कार्रवाई कतई नहीं थी।

चिदम्बरम और रमनसिंह भले ही यह दावा करेें कि वे जो भी कर रहे हैं वह युद्ध नहीं है और यहां पर आपरेशन ग्रीनहंट जैसा कुछ भी नहीं चल रहा है, सच तो यह है कि पिछले तीन सालों से जनता पर एक अन्यायपूर्ण युद्ध चल रहा है। यह बात सर्वविदित है कि देश के सभी आदिवासी इलाके अपार खनिज, जल वन सम्पदाओं से समृद्ध हैं और उन्हें लूटने-खसोटने के लिए बड़े पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने यहां की सरकारों के साथ लाखों करोड़ रुपयों के एमओयू कर रखे हैं। खासकर ऐसे समय जबकि दुनिया भर में तीखा आर्थिक संकट फैल चुका हो, बड़े कार्पोरेट घराने पिछड़े देशों से प्राकृतिक संसाधनों का बड़े पैमाने पर दोहन करने के लिए होड़ लगाए बैठे हैं ताकि खुद को संकट से उबारा जा सके। इसके लिए वे भारत जैसे गरीब देशों के दलाल शासकों पर सम्पदाओं को जल्द से जल्द लुटवा देने का दबाव डाल रहे हैं। लेकिन जनता, खासकर आदिवासी और उनकी अगुवाई में खड़े माओवादी इस लूटखसोट की राह में सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं। यही वजह है कि देश के शासकों ने एक साजिश के तहत ही यह प्रचार शुरू किया कि माओवादी आंदोलन देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है वे इस भ्रम में हैं कि इस आड़ में वे अमानवीय हत्याकाण्डों और अपनी तमाम फासीवादी करतूतों को जायज ठहरा सकेंगे। नरसंहारों को अंजाम देकर, गांवों को खाली करवाकर, तमाम आदिवासी इलाकों को मानवरहित बनाकर अपनी उन्मुक्त लूटपाट का रास्ता साफ करने की नीयत से ही साम्राज्यवादी आकाओं की शह पर भारी विनाशकारी दमन अभियानों को चलाया जा रहा है। यह इसी का हिस्सा है।

भारत के शासक वर्ग जो खुद को जनवादी तरीके से चुने जाने और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रतिनिधि होने की डींगें मारते हैं, जहां एक ओर आए दिन अत्यंत क्रूर फासीवादी करतूतों, हत्याओं और नरसंहारों को अंजाम दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वे उनके सुर में सुर मिलाने वाले मीडिया और उनकी चरण सेवा में समर्पित बुद्धिजीवियों के सहयोग से इन पर परदा डालने की कोशिश कर रहे हैं। जनता का कत्लेआम करते हुए खुद को जन सेवक होने का ढोंग कर रहे हैं। अपने ही द्वारा रचित संविधान का हर पल उल्लंघन करते हुए संविधान का पालन करने का दिखावा कर रहे हैं। जनता पर जारी इस तरह के हत्याकाण्डों और पाशविक हमलों को और ज्यादा कानूनी सुरक्षा हासिल करने के लिए एनसीटीसी जैसी क्रूर व्यवस्थाओं तथा और ज्यादा फासीवादी कानूनों को लाने के लिए उतावले हो रहे हैं।

सस्ती राजनीतिक फायदे के लिए ही छत्तीसगढ़ कांग्रेस पार्टी इस हत्याकाण्ड का विरोध करने और इस पर सीबीआई द्वारा जांच कराने की मांग करने का दिखावा कर रही है। इस तरह वह इस सच्चाई पर परदा डालने की कोशिश कर रही है कि यह हत्याकाण्ड उन्हीं की पार्टी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की शह पर, खासकर चिदम्बरम की प्रत्यक्ष देखरेख में हुआ था। कोरे अवसरवाद और निर्लज्ज छल-कपट के लिए इससे बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी समूची जनता, जनवादियों, छात्र-बुद्धिजीवियों, क्रांतिकारी, जनवादी और मानवाधिकार संगठनों, आदिवासियों के हितैषियों, मीडिया के दोस्तों समेत तमाम देशभक्तों से अपील करती है कि इस जघन्य हत्याकाण्ड का खण्डन करेें और इसके लिए जिम्मेदार चिदम्बरम रमनसिंह को पद से हटाने की मांग करें। चिदम्बरम, रमनसिंह, ननकीराम कंवर, आर.के. सिंह, विजयकुमार, अनिल नवानी, रामनिवास, लांगकुमेर समेत इस हत्याकाण्ड में शामिल सभी अधिकारियों और जवानों को फौरन गिरफ्तार कर कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग करें। हमारा आग्रह है कि आप सभी इन गांवों का दौरा कर पीड़ितों से मिलें और सच्चाइयों को प्रत्यक्ष जान-समझकर प्रचारित करें। हमारी अपील है कि इसके खिलाफ देश भर में सभा, जुलूस, धरना, प्रदर्शन आदि को आयोजित कर एकजुटता के साथ आंदोलन चलाएं। हम दुनिया भर के जनवादियों, क्रांति के समर्थकों और दोस्तों से अपील करते हैं कि भारत सरकार द्वारा देश की जनता पर जारी युद्ध आपरेशन ग्रीन हंट को फौरन रोकने तथा बस्तर में प्रशिक्षण के नाम पर तैनात भारतीय सेना और अर्द्धसैनिक बलों को वापस लेने की मांगों के साथ अपने-अपने देशों में सभाओं प्रदर्शनों का आयोजन करें।

(गुड्सा उसेण्डी)

प्रवक्ता,

दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)